ईसामसीह की कहानी : Story Of Jesus Christ In Hindi

 ईसामसीह या जीसस क्राइस्ट ईसाई धर्म के संस्थापक थे । ईसाई लोग इन्हें ईश्वर का पुत्र मानते है । इन्होने इंसान को मानवता का सन्देश दिया । उनके द्वारा स्थापित ईसाई धर्म अनुयायियों की संख्या आज विश्व में सबसे अधिक है । इस धर्म का प्रमुख ग्रन्थ ‘बाइबल’ है ।

जन्म और बचपन : लगभग 4 ई.पूर्व इस्राइल प्रदेश के नाजरेथ शहर में’ मरियम’ नाम की एक युवती रहती थी । उसका विवाह युसूफ नामक बढ़ई से तय हुआ था । कहते है कि ईश्वर ने देवदूत गैब्रियल को मरियम के पास भेजा ।  वह मरियम के पास जाकर बोला कि “आपको शांति  ! प्रभु आपके साथ है ।”
जब मरियम ने देवदूत को देखा तो डर गयी । तब देवदूत ने उनसे कहा , ‘मरियम डरो नही,आपको ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है । आप एक पुत्र को जन्म देंगी । उसका नाम ‘येसु ‘ रखियेगा । वे महान होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेगे । वे राजा होंगे और उनके राज्य का कभी अंत नही होगा ।’ यह कह कर देवदूत विलीन हो गये । इसके बाद ईश्वर की असीम कृपा से मरियम गर्भवती हुयी ।
युसूफ ने बदनामी के डर से मरियम को छोड़ने का मन बना लिया था । लेकिन गब्रियल के समझाने पर कि मरियम पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती है । उसे अपने यहां लेने से  मत डर । गब्रियल की बात मानकर युसूफ ने मरियम से ब्याह कर उसे अपने घर ले आया । युसूफ और मरियम नाजरेथ में रहा करते थे । उस समय नाजरेथ रोमन साम्राज्य में था ।



रोमन सम्राट आगस्टस के आदेश पर  जनगणना की आज्ञा दी गयी ।  उस समय मरियम गर्भवती थी । प्रत्येक व्यक्ति को बैथेलहम में जाकरअपना नाम दर्ज कराना  था । वहाँ बड़ी संख्या में लोग आये थे । सभी धर्मशालाये और आवास पूरी तरह भरे थे । अन्त में उनको एक अस्तबल में जगह मिली । यही पर 25 दिसंबर को आधी रात के समय महाप्रभु ईसा का जन्म हुआ । उन्हें एक चरनी में लिटाया गया । वहाँ कुछ गरेड़िया भेड़ चरा रहे थे । वहाँ एक देवदूत आया और उनसे कहा कि ‘यहाँ एक मुक्तिदाता का जन्म हुआ है , वही भगवान् ईसा है । अभी तुम कपड़ो में लिपटे एक शिशु को नाद में पड़ा देखोगे ।’ गड़ेरियो ने जाकर ईसा को देखा और उनकी स्तुति की । ईसाईयो के लिए इस घटना का बहुत महत्व है । वे जीसस को ईश्वर का पुत्र मानते है । अतः ईसाइयो के लिए यह ख़ुशी और उल्लास का दिन था । क्योंकि ईश्वर का पुत्र यीशु  सभी के कल्याण करने के लिए पृथ्वी पर आये थे ।

ईसा मसीह बचपन से ही बहुत ही दयालु स्वभाव के थे । 12 वर्ष की अवस्था में वे यरुशलम में तीन दिन रूककर  एक मंदिर में उपदेशकों के बीच उनको सुनते और प्रश्न करते पाये गए । लोग उनके संवाद से दंग रह जाते । इसके बाद उन्होंने अपने पिता के व्यवसाय को अपनाया  और 29 वर्ष की उम्र तक उसको करते रहे ।

ज्ञान प्राप्त होना : बाइबल के अनुसार  30 वर्ष की आयु में ईसा ने यूहन्ना (जान) से ज्ञान प्राप्त किया ।  उसके चालीस दिनो के उपवास के बाद वे लोगो को शिक्षा देने लगे । ईसा ने इस्राइल की जनता को यहूदी धर्म का नया संदेश प्रचारित करना शुरू किया । उनके अनुसार ,ईश्वर जो केवल एक  है साक्षात् प्रेमरूप है। ईश्वर सभी मुल्को को प्यार करता है । इंसान को क्रोध में बदला नही लेना चाहिए साथ ही क्षमा करना सीखना चाहिए । उन्होंने कहा कि वे ही ईश्वर के पुत्र है,वे ही मसीहा है और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग है । ईसा के अनुसार कयामत के समय स्वर्ग या नर्क इंसानी आत्मा को मिलेगा ।
ईसा मसीह की मृत्यु :  यहूदी कट्टपंथियो धर्मगुरुओ ने ईसा का भारी विरोध किया । उन्हें ईसा में मसीहा जैसा कुछ भी न लगा । उन्हें अपने कर्मकाण्डों से प्रेम था । खुद को ईश्वर बताना उनके लिए पाप था ।
अतः उन्होंने उस वक्त के रोमन गवर्नर पिलातुस से इसकी शिकायत कर दी । कट्टरपंथियों को प्रसन्न करने के लिए पिलातुस ने ईसा को क्रूस पर मृत्यु की सजा सुनाई । उन पर अनेक ज़ुल्म ढाये गए ।  कोड़ो से मारा गया । उनके सिर पर काँटों का ताज पहनाया गया । उन पर थूका गया । उनके हाथ पैरों में कील ठोक कर उन्हें क्रूस पर लटका दिया गया । शुक्रवार के दिन उनकी म्रत्यु हुयी । अतः इस दिन को गुड फ्राईडे कहते है । ईसाईयो का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इंसानो के पाप स्वयं पर ले लिये थे । उनके इतना अत्याचारों करने वालो पर भी  ईसा कहते है कि’ प्रभु इन्हें क्षमा करना क्योकि यह नही जानते की ये क्या कर रहे है ।’
मृत्युके तीन दिन बाद ईसा पुनः जीवित हो गए । ऐसा एक स्त्री ने उन्हें कब्र के पास जीवित देखा । इस घटना को ‘ईस्टर ‘के रूप में मनाया जाता है । 40 दिन बाद सीधे स्वर्ग चले गए ।
ईसामसीह का संदेश : ईसा के 12 शिष्यो  ने उनके नए धर्म को सभी जगह फैलाया । यही धर्म  ‘ईसाई  धर्म’  कहलाया । ईसा मसीह द्वारा बहुत से चमत्कार  हुए । उन्होंने बीमारों को प्रार्थनाओं के जरिये स्वस्थ किया । बाइबल में ऐसा उल्लेख मिलता है कि एक व्यक्ति को फिर से जिंदा कर दिया । इसके अतिरिक्त कुछ दुष्ट आत्माओ में फंसे व्यक्तियों को उनसे मुक्ति दिलायी ।

उनके अनुसार ,’ ऐसा व्यवहार जो आप अपने लिए सोचते हो, वैसा ही हमें दूसरो के साथ करना चाहिए ।’
‘मनुष्य को एक दूसरे की सेवा करनी चाहिए । यही सच्ची ईश्वर सेवा है ।’
‘कृपा और सच्चाई तुझसे अलग नही है । अतः इसको अपने से अलग मत करो ।’
ईसा मसीह ने उस समय के कर्मकांड और पाखंड का विरोध किया । इंसान को मानवता का पाठ पढ़ाया ।आपस में नफरत की जगह प्यार का संदेश दिया । यही कारण है कि आज विश्व में  इसाई धर्म को मानने वाले सबसे अधिक है ।

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14 comments

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