हज़रत मुहम्मद साहब ; HAZRAT MUHAMMAD IN HINDI


‘ला इलाह इल्लाला ,मोहम्मद रसुल्लाह ‘
इस्लाम धर्म के संस्थापक और आख़िरी नबी ‘मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह इब्न अब्दुल मुत्तलिब ‘ का जन्म 9 रबीउल ,53 हिज़री पूर्व 20 अप्रैल,571 ई. को अरब के मशहूर क़बीले कुरैश और शहर मक्का मे हुआ था । आपके जन्म से पूर्व ही उनके पिता का देहांत हो गया था। 6 वर्ष के थे तो माँ हजरत आमना का देहांत हो गया । आपके चचा अबू-तालिब ने उनकी परवरिश की ।
  हज़रत मुहम्मद (सल्ल) शुरू से ही हर बुराइयों से दूर थे । शराब, जुआ और बुत परस्ती से अपने आप को बचा कर रखा । हमेशा सच बोलते थे । इसलिए उनको ‘सादिक’ कहा जाता था । आप अमानतदार थे, तभी लोग उन्हे ‘अमीन’  कहते थे । आपके क़बीले का मुख्य पेशा व्यापार था । अतः बड़े होकर  अपने चचा क़े साथ सीरिया और यमन के के दूर- दराज के देशो की यात्राये की ।
अरब में व्याप्त बुराइयों से स्वयं को बचायेे रखने के लिए चिंतन मनन और अल्लाह की इबादत करने के लिए उन्होंने मक्का के निकट ‘हिरा’ नामक गुफ़ा को चुना । उसी गुफा में वे कई -कई दिनों तक ध्यान में रहते थे । इसी गुफा मे चालीस वर्ष की अवस्था में , एक दिन अल्लाह ने अपने फ़रिश्ते जिबरीन ‘अलैहि’ के माध्यम से आपको ईश्वर का सन्देश पहुंचाने के लिए आपको पैग़म्बर बनाया ।
इसी स्थान पर पहली ‘वहय ‘के साथ क़ुरान का अवतरण प्रारंभ हुआ । फ़रिश्ते ने कहा पढ़, आपने कहा – मैं पढ़ा हुआ नही हूँ । फ़रिश्ते ने फिर से पढ़ने को कहा आपने फिर कहा कि मै पढा नही हूँ । तीसरी बार फ़रिश्ते ने कहा- पढ़ो ,अपने रब के नाम क़े साथ जिसने पैदा किया , पैदा किया इन्सान को ख़ून के एक लोथड़े से ।  पढ़ो हाल यह की तुम्हारा रब बड़ा ही उदार है । जिसने कलम के द्वारा शिक्षा दी । मनुष्य को वह ज्ञान प्रदान किया जिसे वह नही जानता ।   (कुरआन ,96;1-5 )


हज़रत मुहम्मद साहब पर जो अल्लाह की पवित्र किताब उतारी गयी ,वह है’ कुरआन’ अल्लाह ने फ़रिश्तों के सरदार जिब्राइल अलै के मार्फित पवित्र संदेश सुनाया। उस सन्देश को ही कुरआन में संग्रहित किया गया है।

सर्वप्रथम नबी (सल्ल) ने अपने घर वालो और मित्रों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाया और कहा कि बुतों की पूजा छोड़कर एक ईश्वर की उपासना करो । इसके अतिरिक्त और कोई उपास्य नही है । मैं ईश्वर का दूत हूँ । थोड़े ही समय में लगभग 40 लोगो ने इस्लाम क़बूल कर लिया ।
अल्लाह के आदेश पर सल्ल ने एक दिन मक्कावासियों को जमाकरके उनसे पूछा कि तुम मुझे सच्चा मानते हो या झूठा । लोगो ने कहा ‘,हम आपको अच्छी तरह जानते है कि आप एक सच्चे इंसान हो ।’
आपने कहा कि ऐसा है तो मेरी बात मानो, मुझे अल्लाह ने अपना पैगम्बर नियुक्त किया है । तुम लोग एक ईश्वर को मानो और बुतपरस्ती छोड़ दो । किंतु लोगो ने उन्हें सच्चा मानने के बाद भी  ईश्वर का पैंगबर मानने और एक ईश्वर की उपासना और बंदगी करने से इंकार कर दिया । इंकार करने वालों को अरबी मे काफ़िर कहते है । माननेवालो और आज्ञा पालन करने वालो को ‘मुसलमान ‘कहा गया ।
इसके बाद इस्लाम के मानने वालों और इस्लाम विरोधियो के बीच संघर्ष शुरू हो गया । हजरत मुहम्मद को सताया जाने लगा । उन पर तरह -तरह से जुल्म ढाये गए । इस्लाम विरोधियों के उत्पीड़न को देखते हुए आप सल्ल ने कुछ मुसलमानों को मक्का छोड़ कर हब्शा देश चले जाने की इजाज़त दे दी । इन ज़ुल्मो और ज्यातियो के बावजूद भी इस्लाम धर्म फलता -फ़ूलता रहा । इसके साथ ही मक्का में आपके चचा हजरत हमज़ा (रजि.) और हज़रत उमर (रजि.) ने इस्लाम धर्म क़बूल कर लिया । इससे मुसलमानों को काफ़ी बल मिला ।
इस्लाम विरोधियों ने अल्लाह के पैगम्बर(सल्ल) और उनके खानदान  का सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया था । इसी मुसीबत में आपके चचा अबू-तालिब और आपकी नेक पत्नी हजरत ख़दीजा (रज़ि. ) का भी निधन हो गया ।


मक्का के उत्तर में एक शहर आबाद था ,जिसे मदीना कहते है । इसे पहले यसरीब’ के नाम से जाना जाता था । यहाँ के लोग बड़े ही नर्म दिल ,खुशअखलाक़ और सदाचारी थे । यह बसे यहूदियो  की धार्मिक पुस्तक की भविष्यवाणी के आधार पर एक नबी के आने का इंतजार था । जब उन्हें यह खबर मिली की मक्का में एक शख्स ने नवी होने का दावा किया  तो उन्होंने सच्चाई का पता लगाने के लिए एक वफ्द (प्रतिनिधि मंडल )भेजा । हजरत मुहम्मद (सल्ल.)  को सच्चा पाकर उन लोगो ने तुरंत इस्लाम धर्म क़बूल लिया । इसके बाद मदीना में इस्लाम धर्म फ़ैलने लगा ।

53 वर्ष की आयु में अल्लाह की ओर से हजरत मुहम्मद (सल्ल.) मदीना चले जाने का हुक्म मिला । इस्लाम विरोधयो को इसकी भनक लग गयी और वे उनको मारने के लिए रात में  घर के सामने एकत्र हो गये । अल्लाह के रहम से दुश्मन बाहर ऊँग रहे थे और उन्हें नबी (सल्ल.) के जाने की खबर तक न थी । हज़रत मुहम्मद  (सल्ल.)  अपने मित्र हजरत अबू-वक्र (रजि.) के साथ तीन दिन तक एक गुफ़ा में ‘गारे-सौर’ में फिर मदीना चले गये । मदीना पहुँचने पर नबी (सल्ल.) का बहुत ही गर्म जोशी और ख़ुशी से स्वागत हुआ । हज़रत मुहम्मद और मुसलमानो की मक्का छोड़ के मदीना चले आने की इस ऐतिहासिक गठन को ‘हिजरत’ कहा जाता है ।

मदीना पहुँच कर नबी (सल्ल.) ने सबसे पहले दो अहम कार्य किये । पहला ‘ मस्जिद-नबवी’ की बुनियाद डाली ।यह मस्जिद इबादतगाह के साथ ही मुसलमानों का एक अहम राजनीतिक केन्द्र थी । दूसरा अहम काम भाईचारा कायम रखना था । चूँकि हिजरत करके आये हुए मुसलमान अपना घर- बार छोड़ कर आये थे । अतः नबी (सल्ल.) ने उन्हें मदीना वासियों के सुपुर्द करते हुए कहा कि ये तुम्हारे भाई है । फिर तो उन्होंने ,इन्हें सगे से बढ़कर समझा । यहाँ तक की अपनी जायदाद में भी हिस्सेदारी दी । इतिहास में ऐसा उदाहरण बहुत कम  मिलता है । इस घटना से मदीनावासी अंसार (मददगार ) कहलाये ।
मदीना में इस्लाम की मजबूती को देखते हुये मक्का के इस्लाम विरोधियो ने फ़ौजी कार्यवाई करने का निर्णय लिया । उन्होंने मदीना पर तीन बार आक्रमण किया । लेकिन संख्या में अधिक होने के बाद भी हर बार उन्हें हार मिली । इस्लामी आंदोलन को जहाँ एक ओर दुश्मनों  के  हमलो का सामना करना पड़ रहा था । वही दूसरी तरफ़ मुनाफ़िक़ों की शरारत भी एक बड़ी समस्या थी । वे मुसलमान बनकर मुसलमानो के बीच लड़ाने का प्रयास करते थे । नबी (सल्ल.) ने बड़ी ही सूझ-बूझ से उनको रोका और मुसलमानों को सुरक्षित रखा ।

अहज़ाब की लड़ाई के बाद नबी (सल्ल.) हज के इरादे से 1400 मुसलमानों के साथ मक्का की ओर रवाना हुए । इस्लाम विरोधियों ने उन्हें रोकने की योजना बनाई ।  मुहम्मद सल्ल ने हुबैदिया नामक स्थान पर पड़ाव डाल कर कुरैश के पास अपना दूत भेजा कि वे लड़ाई करने नही बल्कि हज करना चाहते है । लेकिन इस्लाम दुश्मनों ने उस दूत के साथ दुर्व्यवहार किया । फिर हजरत उसमान को भेजा गया । अंततः 6 हिजरी 628 ई. सुलह-हुबैदिया के नाम से एक समझौता हुआ कि मुसलमान इस वर्ष वापस चले जाएं और अगले वर्ष हज के लिए आये । हजरत मोहम्मद ने वें शर्ते मान ली और मदीना वापस चले आये । इसके बाद मुसलमान और इस्लाम विरोधियों के आपसी मेल- जोल बढ़ें । फलस्वरूप बड़ी संख्या में लोग मुसलमान होने लगे । इसके साथ ही ईरान ,रोम, मिस्र और हब्श के बादशाहो को भी इस्लाम का संदेश भिजवाया गया । जिसके अच्छे परिणाम आये । आप ने इंसानियत और मानवता की सीख दी ।
सुलह – हुदैबिया के दो साल बाद जब मक्का के लोगो ने मुसलमानों से किया समझौता तोड़ दिया तो हज़रत मोहम्मद  (सल्ल .) ने दस हज़ार मुसलमानों को लेकर सन् 8 हिज़री (628 ई.) में मक्का में प्रवेश किया । मुसलमानो की इतनी बड़ी संख्या को देख कर विरोधियों के होश उड़ गए । उन्होंने बिना लड़े ही शहर मुसलमानों के हवाले कर दिया । इस्लाम के दुश्मन जिन्होंने आप पर इतने जुल्म और सितम ढाये । जिनके कारण उन्हें अपना वतन छोड़ना पड़ा । उन्होंने सभी को माफ़ कर दिया । मानवता का ऐसा इतिहास कही  नहीं  देखने को मिलता है । पैगम्बर के इस सद्व्यवहार और उनकी शिक्षा से प्रभावित होकर बहुत लोगो ने इस्लाम  अपनाया ।

आप ने इंसानियत का संदेश दिया । ऐसा नही है कि सिर्फ मुस्लिमो को ही यह संदेश दिया । गैर मुस्लिमों को भी उन्होंने इंसानियत का पाठ पढ़ाया । मानवता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, इसकेे लिये उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया ।
सन् 10 हिज़री में नबी (सल्ल.) ने हज का इरादा किया ।आपके साथ एक लाख से अधिक मुसलमानों ने हज किया । इस अवसर पर आपने भाषण दिया जो ‘ख़ुत्ब-ए-हिज्जतुल- विदा’ अर्थात आखिरी हज की तकरीर के नाम से प्रसिद्ध है । नबी (सल्ल.) ने बताया कि “मै ऐलान करता हूँ कि ईश्वर के सिवा कोई उपास्य नही । वह अकेला है ,उसका कोई साझी नही और मै ऐलान करता हूँ कि मुहम्मद उसका बन्दा और उसका पैगम्बर है।’ मै तुम्हारे बीच एक ऎसी चीज़ छोड़े जा रहा हूँ कि जब तक उस पर चलते रहोगे कभी सत्य मार्ग से न हटोगे ,वह है अल्लाह की किताब (क़ुरआन) ।” ईश्वर एक है और समस्त मानव आदम (अलैहि.)की संतान है और वे सब बराबर है । किसी अरबी को गैर अरबी पर और गैर -अरबी को अरबी पर,काले को गोरे पर और गोरे को काले पर कोई श्रेष्टता प्राप्त नही । यदि श्रेष्टता प्राप्त है तो भले कर्मो के कारण ।”
वही अरब जहाँ आप (सल्ल.) के जान के दुश्मन बन गए थे ,एक दूसरे के खून के प्यासे थे ,चारों ओर अशांति,लूटपाट लड़ाई झगड़ा व्याप्त था ,अनगिनत बुतों की पूजा की जाती थी । वही अरब नबी (सल्ल.) के 23 वर्षो के प्रयास से आपके आदेश पर एक दूसरे पर जान कुर्बान करने को तैयार थे । चारो ओर सुख शान्ति का माहौल बन गया था ।
आख़िरी हज के बाद नबी (सल्ल.) मदीना वापस आ गए और कुछ महीने के बाद , 63 वर्ष की आयु में 12 रबीउल-अव्वल,11 हिजरी (11जून 632ई.) को आपका बुखार के कारण देहांत हुआ । अंतिम समय में आपने मिस्वाक (दातुन) की और बोले ,” नमाज़- नमाज़ -नमाज़ और लौंडी और गुलाम के अधिकार ।” इसके बाद आपकी जुबान से अंतिम शब्द के रूप में निकला-अल्लाहुम-म बिर्रफीक़ील आला” अर्थात् ऐ अल्लाह ! सबसे बड़े साथी (यानि अल्लाह) से मिलने की ख्वाईश है ।
हज़रत मुहम्मद ने मानवता के महत्व को और उसकी सच्चाइयो को जनमानस तक पहुँचाया । उनको ऐसे भावपूर्ण और जोशपूर्ण भाषण देते थे कि लोग भावविभोर हो जाते थे और उनकी आखो से आँसू बहने लगते थे । जन -जन के ह्रदय में उनके प्रति प्रेमभाव था । इतनी कठनाईयो  के बावजूद भी सैन्य शक्ति जुटाई और उसमे वे हमेशा सफल रहे।  आपको इसकी परवाह नहीं  थी कि जो शक्ति आपको प्राप्त थी , उसके प्रदर्शन के लिए उन्होंने सदा पहरेज किया।  आपके निजी जिंदगी में जो सादगी थी, वही  सादगी आपके सार्वजनिक जीवन में भी थी ।

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11 thoughts on “हज़रत मुहम्मद साहब ; HAZRAT MUHAMMAD IN HINDI

  • May 28, 2017 at 10:47 pm
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    आपके लिखने की शैली बहुत अच्छी है । आप अपने लेख में हर चीज का विस्तार से वर्णन करते है जिससे पढकर पूरी जानकारी मिलती है। इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद जी के जीवन के बारे बताने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

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    • November 25, 2017 at 10:31 pm
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      Per me to janana chata hu ki ki kaba ke kale kepde ke piche kya ha kya koyi muslmal bata sakta ha ki o kiski ki prikarma karta ha kisi ne dekha ha os kale kapde ke peche kya ha.

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  • June 11, 2017 at 10:34 am
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    Good article really appreciable

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  • September 6, 2017 at 5:50 pm
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    thanking you, sir

    this article is very helpful for me

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  • September 22, 2018 at 10:14 pm
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    Mere nabi Muhammad S, aw ki pedaish bhi 12 raviul awal ko hui thi

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