दिवाली त्योहारों का समूह : Essay on Diwali in hindi : दीपावली पर निबंध :

दिवाली त्योहारों का समूह : Essay on Diwali in hindi : दीपावली पर निबंध :

दीपावली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है । यह त्योहार धार्मिक और सामाजिक महत्व रखता है । यह पर्व भारत के अतिरिक्त नेपाल ,लंका, म्यांमार,संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ,ब्रिटेन,सिंगापुर, मारीशस आदि देशो में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ।
दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है । इसको दीपोत्सव भी कहते है । दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘दीप ‘और ‘अवली ‘अर्थात ‘दीपो की श्र्ंखला’से है ।

मनाने का कारण : इस दिन भगवान् श्री राम,लक्ष्मण और सीता 14 वर्षो के पश्चात् लंका के राजा रावण पर विजयी प्राप्त करके अयोध्या वापस आये थे । इसी ख़ुशी में अयोध्यावासियो ने अपने घरों में घी के दीये जलाएं । इससे पूरा शहर जगमगा उठा। तब से अब तक सभी लोग दीपावली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते है ।उपनिषद के अनुसार,’तमसो मा ज्योतिर्मय’ अर्थात अँधेरे से प्रकाश की और जाना या दुख से सुख की ओर गमन करना । जैन धर्म के अनुसार महावीर जी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी । अतः जैन सम्प्रदाय इसे ‘मोक्ष दिवस ‘के रूप में मनाते है ।
दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते है । समुंद्र मंथन के समय लक्ष्मी जी उत्पन्न हुयी थी । दीपावली की रात को ही लक्ष्मी जी ने विष्णु जी को चुना था और उनसे विवाह किया था ।
ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने से सम्पन्नता आती है । लक्ष्मी जी के साथ ही बुद्धि के देवता गणेश की भी पूजा की जाती है । इससे सभी कष्टो का नाश होता है ।
कृष्ण भक्ति धारा के मत के अनुसार ,कृष्ण ने उज्जयनी के राक्षस राजा नरकासुर का वध किया था । इससे भी सभी लोग हर्ष से दीपावली मनाते है ।



विष्णु जी ने नरसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकश्यप का वध भी इसी दिन किया था ।
दीपावली को त्यौहारों के समूह के रूप में मनाया जाता है । यह पाँच दिनों तक चलता है ।
धनतेरस : शास्त्रो के अनुसार दिवाली के दो दिन पहले अर्थात कार्तिक कृष्णपक्ष के त्रियोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरि हाथो में स्वर्ण कलश लेकर समुंद्र मंथन से उत्पन्न हुए थे । इसलिए इसे धनतेरस कहा जाता है ।इस दिन बर्तन खरीदने की परम्परा है । धन्वन्तरि ने कलश से भरे अमृत से देवताओं को अमर बना दिया था । धन्वन्तरि को चिकित्सा के देवता ‘ के रूप में जाना जाता है । धन्वन्तरि को विष्णु जी का अंशावतार भी कहा जाता है ।
ऐसी मान्यता है कि धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दिया जलाकर रखने से अकाल मृत्यु नही होती । इस दिन दिवाली में पूजा करने हेतु लक्ष्मी गणेश की मूर्ति खरीदा जाता है । इसे ‘आयुर्वेद दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है ।
छोटी दिवाली : दिवाली के एक दिन पहले छोटी दीवाली को नर्क चतुर्दशी (नर्क चौदस) के नाम से भी जाना जाता है । पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन श्री कृष्ण ने दैत्य नरकासुर का वध कर 16000 कन्याओं को उसके बंधन से मुक्त किया था ।
हनुमान जयंती भी इसी दिन मनाया जाता है। इस दिन हनुमान जी की पूजा अर्चना करने से मनुष्य की सभी कामनाएं पूरी होती है ।
बड़ी दिवाली : इस दिन सम्पन्नता की देवी लक्ष्मी और बुद्धि के देवता गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है । व्यापारी लोग अपना नया बही खाता शुरू करते है। उनकी पूजा की जाती है । सभी अपने घर को सजाते है ,रौशनी से घर जगमगा जाता है । रंगोली बनाते है ।आतिशबाजी करते है । विशेषकर बच्चों का उत्साह तो देखते ही बनता है । घरों में परिवार के सभी सदस्य इक्कट्ठा होकर प्रेम और भाईचारे के बीच भक्ति और निष्ठा पूर्वक यह पर्व मनाते है । रात्रि 8 से 12 बजे तक यह त्यौहार अपने चरम पर होता है । ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी जी का आगमन होता है ।
परीवा और गोवर्धन पूजा : दिवाली के बाद पहले दिन को परीवा के नाम से जाना जाता है । इस दिन गोधन यानि गायों की पूजा की जाती है । शास्त्रो के अनुसार श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए अपने छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी । तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है ।
भैया दूज : दिवाली के दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को बहनें अपने भाई की लंबी उम्र की प्रार्थना करती है । इसे’ मातृद्वितीया व यमद्वितीया’ भी कहा जाता है । एक कथा के अनुसार इस दिन सूर्य पुत्री यमुना ने अपने भाई यमराज को आमन्त्रित किया था । उनको तिलक लगाकर उनका आवभगत किया था ।इससे प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना से वर माँगने को कहा यमुना ने यमराज से हर वर्ष आने का अनुरोध किया ।यमराज ने तथास्तु कह कर यमुना को आशीर्वाद दिया । तभी से यह त्यौहार भैया दूज के नाम से जाना जाता है । इस दिन यमराज और यमुना का पूजा का विधान भी होता है ।

भैया दूज में गोधन कूटने की प्रथा भी है । गोबर को मानव मूर्ति बनाकर छाती पर ईट रखकर कूटने की प्रथा भी प्रचलित है ।भटकैया के कांटे को जीभ में दागती है । ऐसा बहन और भाई के प्रेम को दर्शाता है कि भाई को जीवन में विपत्तियों का सामना न करना पड़े । उनकी लम्बी उम्र की कामना के साथ यह पर्व मनाया जाता है ।


भैयादूज मनाने के साथ ही कायस्थ लोग ब्रह्मा जी के पुत्र भगवान् चित्रगुप्त की पूजा करते है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में चित्रगुप्त भगवान् मनुष्यों के पाप और पुण्य का लेखाजोखा रख कर न्याय करते है । पितामह ने भी चित्रगुप्त की पूजा की थी । जिससे उन्हें इक्छामृत्यु का वरदान मिला था । कायस्थ वर्ग कलम दवात की पूजा करते है और नया कार्य प्रारम्भ करते है ।
महत्व : दीपावली के कुछ दिनों पहले से ही लोग अपने घरो , कार्यालयों और दुकानों में साफ़ सफ़ाई करते है । खरीदारी के लिए यह त्यौहार काफी महत्व रखता है । गहने ,कपड़े, उपकरण और घर के सामानों की खूब खरीददारी होती है । हर नए समानों पर सेल और दिवाली ऑफर लगता है । सोने और आभूषण के लिए यह बहुत बड़ा सीजन माना जाता है । कर्मचारियों को बोनस मिलने से खुशियां दूनी हो जाती है ।
मिठाइयों और नमकीनो का महत्व बढ़ जाता है । घरो में ऐसी व्यंजन बनते है जो कई दिन चलते है ।
दीपावली का त्यौहार रिश्तों में आई दूरियों को कम करता है । आपसी प्रेम और भाईचारे का यह पर्व जब सभी इकट्ठा होकर मनाते है तो परिवारों की खुशियां देखते ही बनती है । दीपावली में पारिवारिक संबंध के साथ ही साथ व्यापारिक सम्बन्ध बेहतर होते है ।
स्वामी रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दोनों ही दीपावली को ही हुआ था । महर्षि दयानंद ने भी समाधि इसी दिन ग्रहण की थी । 1571 में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास भी आज के दिन ही हुआ था ।
सन्देश : इस त्योहार में जुआ और कौड़ी खेलने की परम्परा को लोग शुभ मानते है । लेकिन कब ये इसके गुलाम हो जाते है । उनको पता ही नही चलता । जुए में कई लोग अपने पूरी कमाई तक लगा देते है और बाद में पछताते है । हमे ऐसी बुराइयों को त्यागना होगा ।
आतिशबाजी करने के बाद हवा में अधिक मात्रा में धूल और धुएं के कण पर्यावरण को प्रदूषित कर डालते है । इससे साँस लेना मुश्किल हो जाता है । ओज़ोन की परत में छेद का कारक भी यही है । यदि हम आतिशबाजी मुक्त दिवाली मनाये तो यह एक सार्थक कदम होगा ।

दीपावली का त्योहार हमे अंधकार से प्रकाश की ओर चलने को प्रेरित करता है अर्थात अपने अंदर की बुराइयों को त्यागकर प्रकाशयुक्त सच्चाई के पथ पर चलने की प्रक्रिया । आपसी द्वेष को पीछे छोड़कर हम आपसी भाईचारे और प्रेम को अपनाये यही इस पर्व की महत्ता है ।

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